कई बार मै अपने कमरे की खिड़की से रात को गौर से देखता हु ......
तो देख पाता हु इसकी कशिश भरी खामोशी को .......
वो मेरी बालकॉनी मै लगा पौधा जो दिन भर मदमस्त नृत्य किया करता है ......
वो अब चुप है बिलकुल चुप ....
दूर पटरियों पे दौड़ते सफ़र की आवाज कानो मै सुनाई पड़ती है .....
मै घंटो तक ताकता रहता हु इसी तरह इस खामोश रात को ....
न जाने किस तलाश के लिए................
लोड हो रहा है...