अब जब भी शाम को अकसर चला जाता था छत के किनारे पे..........
उस डूबते हुए रक्तमय वर्ण युक्त सूर्य को देखने............
तब ना जाने क्यू उसके अस्त होते-होते ख़ुद को भी अस्त सा पता था........
एक अजीब सी तन्हायी में सिमटता सा चला जाता था......
ना जाने किस पल के लिये............
या शायद एक पल के लिये.......
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