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चांद......

कभी कभी चाँद को देखता हूँ तो तेरा अक्स नजर आता है.....

उस अक्स से जी करता है बातें करने का...

में यहा से शब्दों को पीरो पीरो के भेजता हु......

पता नही पहुँच भी पाते होंगे वहा तक.....

तब अचानाक से तू बादलो में छिप जाता है.....

शायद शरमा जाता है......

तब बस मेरे लब पे भी मुस्कान सी होती है.........

अस्वीकरण