मैं शब्दों से सरोबोर एक खत छोड़ आया था तेरी मेज पे........
इस उम्मीद से की तेरी निगाहो से होके गुजरेंगे मेरे शब्द.....
कुछ एक दो खामोश मुमकिन रात ही तो थी ,जब लिख पाया था इसे.....
ये सिर्फ़ खत नही मेरी हर रात की खामोशी है.......जो खामोशी से कुछ कहना चाहती है......
ये खत नही मैं ही था...जो हर बार खत के जरिये था.........
हर बार मुझे यौहि लौटना पड़ता था...
खत के जरिये सवाल बनके आया था.....
की कुछ तो जवाब ले जाऊँगा इस बार.....
पर हर बार की तरह कई हिस्सों मैं बदल जाता था मै....
जैसे मेरे शब्द भी थक चुके थे अब बिखरते-बिखरते......
पर फिर शायद एक दो खामोश मुमकिन रात हो...........
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