आज सुबह उठा तो सोचा एक ज़िंदगी जी जाये..........
दिन भर चलता रहा एक तलाश के लिये...........
शाम हुई फिर शाम को पीछे छोड़ आया मै..........
अब रात है....मै हूँ.....ये मयखाना है......
कुछ आवाजे है जो कानो में सुनायी देती है.......
कुछ खमोशी है जो शायाद कुछ कह्ती है.........
कुछ तन्हा सा भी हूँ मै.......
अब काफी रात हों चुकी है......जाने का वक्त है.......
बहकते कदमों से चल भी पाउंगा पता नही.........
कभी-कभी थोड़ी सी पी लेता हु....कभी-कभी कुछ लिख लेता हु.....
अब बस मुझे तलाश है उस इंत्जार की......जिसकी तलाश कभी पुरी ना हो............
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