आओ पतझड़ में शाक से अलग हुए पत्तों के झुरमूट में कुछ वक्त गुजारे..........
सुना है कभी इनकी सरसराहट को........
लो आओ सुने........
ये भी कुछ कहती है.......
जैसे उन दिनों की यादें बया कर रही हो......
जब ये भी मुस्कुराती थी......
हवा के ठंडे झोके के साथ ये भी सिसकिया भरती थी......
ओर सिमट जाया करती थी डॉलियो के बीच......
जब बादल आते तो मैंने देखा था बारिश की ठंडी-ठंडी नन्हि-नन्हि बुंदो से भीग्ते हुए इसे.....
वो जैसे मै खुद को भीगो देता था बारिश मै पुरा वैसे ही.......
कितना अन्नंदमय पलो से लबरेज था वो वक्त्........
पर आज जैसे इस पतझड़ में पतो के झुरमूट का मै भी एक हिस्सा सा ही हु...................:
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