एक दिन लौटते वक्त घर की ओर........युही बस चुने से सनी दीवार को देखा तो हाथों मै रखी कलम को ना जाने क्या सूजी.........
की इन दीवारों पे बना दु तेरी आँखें..........
ओर जगह जगह मैने बना भी दी.....
सोचा जब भी गुज्ररुंगा इस रास्ते से.....तो तेरी निगाहें मुझे रोकेंगी.......
ओर कहेंगी अब कितना तलाश करोगे मुझे........
तो शायद मै कहता तलाश तो उसकी हो जो मिले नही.....
मै तो इंतजार कर रहा हूँ..........
ओर ना जाने अब तक्.........या शायद कब तक्.....

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