आज भी मेरे लिखे हुए शब्दों कि कड़ी में शामिल हो तुम्....
और तुम्हारे वजूद को बरकरार रख पाया हु मै.....
शायद इन्ही शब्दों कि कड़ी से आज तक तुम्हारी वास्तिविक्ता को बचाये रखा है मैने....
वक्त कटता रहा धीमे-धीमे कदमो से बिना आहट के,और तु नये-नये आवरण मै सरोबोर होती गयी......
और खोती रही अपनी वास्तिविक्ता को,,पर मैंने चुरा लिया था तुझसे तेरी वास्तिविक्ता को और जिसे शयाद मै
अब तक बचा पाया हु............. ...........
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