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4 अप्रैल, 2008


ब्लॉग्स (1)
दौडते रहे रास्तेबिना रुका बिना थकेजाने किस वास्तेरात का अंतिम पहरजब सुबह होने में थोडा वक्त बाकी होता हैतब देखा तुझे ठहरते हुएहवा के ठंढे झोंके से यूँ तेरा टकरानाएक अजीब सी साय साय की आवाजमानो तेरे दर्द की दास्तान बया कर रहा होदिन भर तुझ पर रेंगती रही ... आगे पढ़ें...